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 आम लगे बौराने

धूप निगोड़ी हुई गुनगुनी
तेज हुई दिन दूनी
दिन चढ़ते ही लगे उतरने
एक एक कर ऊनी

बची खुची साँसें गिनता है
जाड़ा माघे आधे
पहुँच गया है अब किसान का
दिन में कंबल काँधे
महतो के द्वारे अलाव की
पड़ी अथाई सूनी

प्रगतिशील पोती हो या फिर
दकियानूसी दादी
तेज धूप में होते देखा
सारे छायावादी
शुरू हुई सूरज की कैसी
हरकत अफलातूनी

खेतों में फिर से रंगों की
सजने लगीं दुकानें
परिवर्तन की इस दुविधा में
आम लगे बौराने
खिली धूप में सरसों पीली
दिखे बहुत बातूनी

- रविशंकर पांडेय
१ मार्च २०१९

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