अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

 रंगों का जादू

ओले, वह वर्षा, ठिठुरन
वह कोहरा, हवाएँ वह कंपन
वह धुँधुआती सुबहें, वह कलियाती शामें
अरे अलविदा, अब विदा, अलविदा

वो पतझड़ की डालें, वो ठूँठों के घेरे
पत्ते पुराने जो गिरते थे अविरल
उन्हीं का सँभलना अँखुआना मचलना
कोंपल, यह पल्लव यह कलियों का नर्तन
यह फूलों के डेरे ये तितली के फेरे

जंगल या उपवन
यह मदमस्त मधुकर
बौराए से पादप सुगंधों की वर्षा
यह ढोल मंजीरे मदमस्त फुहारें
यह गीतों की खुशियाँ
यह फगुआ के गीत

सराबोर करते होली संगीत
रंगों का जादू सिकुड़ रही शीत

- मधु संधु
१ मार्च २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter