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फागुन

रंगों के इंद्र धनुष बिखरे
मौसम ने जब खोली पलकें
गीतों के फिर आँचल सँवरे
फागुन ने फिर
गूँथी अलकें

बिंदिया से पायल तक गोरी
बासंती रंगो की टोली
भीगा अम्बर भीगी धरती
भीगी चूनर भीगी चोली
मधु कलश छलकते छ्न्दों के
फूले पलाश जैसे
वन के

राधा के अरुण कपोलों से
मधुशाला का गठबंधन है
मन की छोटी सी बस्ती का
कोना कोना वृन्दावन है
पनघट है यमुना का जल है
किस्से हैं रस के
केसर के

- रंजना गुप्ता
१ मार्च २०१८

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