अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

तन रंग दे आ मन रंग दे

गमके आज द्वार औ आँगन
मन में बोले होरी है।

चाहत के सरगम से छमछम
करती हर इक ओर लगे,
तेरी आहट की खुशबू से
गमगम पोरे पोर लगे,
टूट रहा संयम का पहरा
ये कैसी बरजोरी है

बौराए है तन तरुवर
मन कुमकुम रंग अबीर लगे
आस मिलन की संजोए
दो अँखियाँ जमुना तीर लगे
धक धक डोले जिया कि जैसे
व्याकुल राधा गोरी है

सच बतलाऊँ साजन तुझसे
जबसे आँखे चार हुईं
तेरे परसन के उबटन से
मन कलियाँ गुलजार हुईं
बेकाबू सी आज हुई
लगती साँसों की डोरी है।

लाज न आए खोले दिल ने
राज पिकी हरजाई के
मीठा मीठा टीस जगे
छूते पागल पुरवाई के
हौले रंग उड़ाओ साजन
उमर अभी तो कोरी है।

- शंभुशरण मंडल
१ मार्च २०१७

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter