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फागुनी बयार गंध

रोम-रोम बिंध रहा है
अंग-अंग टूटता है
मौसमों की चाल में
उलझ-उलझ रहा है मन

बह रही शिरा-शिरा में
फागुनी बयार-गंध
मौन मानसी के द्वंद्व
चाहते उदार कंध
अंग-अंग की करे
विवेचना-सी आर्द्र लेप
नीलिमा-हरीतिमा सुस्नात
दृढ़ भुजा-सुबंध

कसमसा के भींच लें
अनंगबिद्ध देह-तन!

टेसुओं की टेर में
सुनो सतत हृदय-पुकार
एक रंग से मगर
करो न योग का सिंगार
हर नयी छुअन लगे
विभिन्न रंग के प्रवाह
छेड़ने लगूँ पुलक
सुहाग-राग बार-बार

आवरण दो वक्ष का
पिया करो न आकलन

- सौरभ पांडेय
१ मार्च २०१७

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