अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

मचा लो धूम

मचालो धूम मिलकर के, चलो इस बार होली में
नहीं बाकी रहे कोई, कसर दिलदार होली में

रँगों के साथ धुल जाये, जमा हर मैल नफरत का
घृणा जल राख हो जाये, बचे बस प्यार होली में

गलतियाँ माफ़ हैं सारी, पकड़ लो आज तो सबको
मिले जो भी लगा दो रंग, मेरे सरकार होली में

पिलाओ और पीओ भंग, करो मस्ती सभी जी भर
मगर ज्यादा बहकना मत, पड़ेगी मार होली में

सजे हर गाल रंगों से, शहर में और गाँवों में
मनालो आज रूठों को, करो मनुहार होली में

बना कर रंग फूलों से, भरो पिचकारियाँ अपनी
खिलाओ और खेलो रंग, सभी से यार होली में

भुला कर सब गिले शिकवे, मनाओ साथ में होली
न कोई जीत होती है, न कोई हार होली में

- बसंत कुमार शर्मा
१ मार्च २०१७

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter