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शीत
शरद |
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गया बादल, मिटा नभ का सांवलापन
खुल गया देखो गगन का सुघड़ आनन!
आ गई ऋतु शरद की उत्सव मनाने
शुभ्र-निर्मल चाँदनी में तैर कर मनभर नहाने
हो रही मंगल ध्वनि शुभ
पर्व पावन!
उतर आया बाढ़ का पानी किनारे
हंस तिरते पंख हैं अपने पसारे
खिले सरसिज हुए सर के
रूप भावन!
मच गई है धूम मां के आगमन की
उग रही है पगध्वनि नव आचरण की
हो रहा है नृत्य, गायन
और वादन!
उधर गरबा इधर होती डांडिया है
हो रही झिझिया झरोखे झाँकती चल रश्मियाँ है
यही गोधन, बाजि धन है,
यही गज- धन!
- उदयशंकर सिंह 'उदय'
१ अक्टूबर २०२६ |
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