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        दीप-घट की आर्चना

 
हिरण्यगर्भा का उत्सव है दीप-घट की अर्चना है
नभ शरद का खिल उठा है, शक्ति की
आराधना है

माटिका के इस घड़े में सृष्टि का स्पंदन छिपा है
बिंदु रंध्रों से छलकती मात की करुणा-कृपा है
छिद्र से जो दीप चमके हृदय सब आनंदमय हैं
है अखिल ब्रह्मांड लीला जगत परमानन्द मय है
ताल पर खनकीं खनकियाँ
राग की नव सर्जना है

चंद्रिका बिखरी धवल सी दीप ज्योति जल रही है
डाँडियों का साज गूँजे लय-प्रवाही मिल रही है
छंद की पायल बजी तो हुआ हर्षित मन गगन
नव दिनों के पर्व में यह चेतना का जागरण
माँ भवानी के चरण में
गीतमय यह वंदना है

दुर्गुणी रिपु-भाव भागे महिष-मर्दन रूप से
शांत अंतस हृदय उर्जित माँ कृपा की धूप से
नारि-गरिमा का समादर हो रहा घट-दीप में
दिव्य मुक्ता ज्योंचमकती सिंधु के हर सीप में
गीत गातीं टोलियाँ हैं
शारदी रस वर्धना है

- सुशील शर्मा
१ अक्टूबर २०२६

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