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          गरबा के जयगान

 
गूँज रहे चहुँ ओर धरा पर
नवरातों में गरबा के जय गान।

गरबे के भीतर
जलता है ऊर्जा का जो दीप
वह ब्रह्मांड का दूर भगाता अंडस और प्रतीप
खाती रहती मूँगफली भी रात-रात भर
गरबे की हर तान।

विश्व समूचा
हो जाता है धरती का गुजरात
हो जाता वह मन का राजा वह मन का सुकरात
खेत-खेत में झूम रहे हैं हरियाली सँग
कोदो-कोको-धान।

गरबा है
उमंग की रातें और डांडिया रास
चनिया-चोली कुर्ता-सूथन स्वयं नाचते पास
ताल और धुन स्वर मिलते हैं और वृत्त का
बढ़ जाता है मान।

- शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
१ अक्टूबर २०२६

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