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         गरबे की थाप

 
माटी का घट, दीप सुशोभित
गूँज रही गरबे की थाप
रात शरद की देखो कैसे
पिघल रहा
सारा संताप

खनक रहे हाथों में कंगन
थिरक रहे हैं पग अविराम
गोट चुनर पर टँकी सजीली
चमक रही अंबा के नाम
टनक टनक बज रहे डाँडिये
मोहक लगते
क्रिया-कलाप

भक्ति और उत्सव का संगम
मौसम लगता है पावन
श्रद्धा के घेरे में गरबा
ज्योतित होता मनभावन
ताल-ताल पर झूम रहा जग
गीतों में
साथे आलाप

- पूर्णिमा वर्मन
१ अक्टूबर २०२६

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