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        गरबा का दीपक

 
गरबा के दीपकों का झर रहा उजास
मन में उमंग, भक्ति का
भर रहा सुवास

आज कंठ हैं मधुर और पद चपल बद्ध
करतल ध्वनि की गूंज से मन
कर रहा हुलास

चुनरी कहीं उड़ी चुड़ियों की खनक है
इंद्रधनुषी वसन चहुं ओर
हर रहा वातास

शक्ति की अराधना में शीश हैं झुके
तन झूम झूम परमात्म का
वर रहा आभास

नवदिन और नवरात आत्मशुद्धि के लिए
जन-जन आज तन-मन से
धर रहा उपवास

- पूर्णिमा जोशी
१ अक्टूबर २०२६

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