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        मनवा डोले

 
आओ मिलजुल गरबा खेलें
झूमे रे मन, मनवा डोले

माँ के आँगन दीप जलें मन में नव उल्लास पलें
ताल मिले तो हाथ उठें, रंग भरे ये पाँव चलें
माटी का गरबा मुस्काए दीप सुनहरी ज्योति लुटाए
मन के बंद कपाट भी खोले
झूमे रे मन, मनवा डोले

दुख की बदली दूर हटे मन का मौसम आन सजे
चुनरी उड़कर नभ छू जाए पायल मधुर तराने गाए
मेहंदी रचते हाथ सुहाएँ, झूमें मिलकर गाने गाएँ
ढोल बजे जीवन रस घोले
झूमे रे मन, मनवा डोले

हाथों में जब हाथ मिलें सूने मन में फूल खिलें
गरबा लोक-हृदय की बोली इसमें जीवन की रंगोली
माँ के आँगन दीप जलें मन में नव उल्लास पलें
साथ साथ हर कोई बोले
झूमे रे मन, मनवा डोले

- निरुपमा सिंह ढाका
१ अक्टूबर २०२६

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