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         गरबे की थाप

 
सर्व विद्या बहुल प्रेमा, जग कृपा माँ कीजिए
सद्गुणों से हो सुपूरित
ज्ञान हमको दीजिए

मौन होकर सत्य आँखें, फेर कर गूँगा हुआ
आज माता चेतना भर, जागने की है दुआ
काल का दिन हर्षमय है, दिव्य माँ नवरात्र है
मातु की जग में दया हो, शक्ति-ऊर्जा गात्र है
ज्ञान मुझको छंद का दें, प्रार्थना सुन लीजिए
भक्ति श्रद्धा मन जगा कर
प्रेम मुझ से कीजिए

डंडिया से झूम गरबा, द्वार तेरे नाचती
अंत तेरी बाँह में हो, गीत ये ही बाँचती
हाथ जोड़ूँ प्रार्थना में, नित्य करती साधना
सिद्ध करना काम सारे, पूर्ण करना कामना
रिद्धि का भंडार हो माँ, सिद्धि का पथ कीजिए
द्वार तेरे मातु आयी
रिक्त मन भर दीजिए

भाग्य मेरे जाग जाए, शीश पर कर राखिए
भोग छोले का लगाती, आप इनको चाखिए
भक्त सुमिरन चाव से है, आस उनमें जाग दें
चित्त में अवगुण भरे हैं, सर्व मेरे त्याग दें
वास होवे शुद्ध मन में, सोच ऊँची कीजिए
भक्ति में हम डूब जाएँ
मोक्ष हमको दीजिए

- डॉ मंजु गुप्ता
१ अक्टूबर २०२६

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