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        मुस्कराई चाँदनी

 
घूँघट हटा कर
बादलों का मुस्कराई चाँदनी

शुभ शगुन होने लगे थिरकने पायल लगी
इठला रही हैं बाग में तितलियाँ भी रसपगी
हँस रहा आकाश
कुछ सकुचा रही है यामिनी

कौन जाने कल यहाँ चुपके से आया कौन था
घुँघरूओं की खनक से जागा सहन जो मौन था
स्वप्न फिर बुनने लगी
बावरी अनुरागिनी

हलचलें होने लगीं हैं बरोठे में और छत पर
एक कोने में छिपा है बादलों का अहम थक कर
खिलखिला कर हँसी फिर
रूठी हुई थी मानिनी

- मधु प्रधान
१ अक्टूबर २०२६

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