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        नवरात्रि में

 
नवरात्रि में -
गरबा करने लगी हवाएँ

जगह-जगह
हो रही है रामलीला
दूर कहीं
जुगनुओं का है कबीला
जिंदगी से पाप
हरने लगी हवाएँ

दुर्गा जी की
सजी हुई झाँकी है
सूरत शाम के पहर की
बाँकी है
सन्नाटे में शोर
भरने लगी हवाएँ

कस्बे में शोरगुल-
कोलाहल है
कहीं-कहीं जैसे
होता शग़ल है
बिगड़े माहौल से
डरने लगी हवाएँ

- अविनाश ब्यौहार
१ अक्टूबर २०२६

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