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        धूप बतियाने चली आई

 
गा रही है शरद ऋतु की हवा चौपाई
खिड़कियों से धूप
बतियाने चली आई

मुस्कुराता दिख रहा है प्रात का सूरज
फिर कनेरों पर फहरने लगे पीले ध्वज
लौट आये दिन खुशी के
बजी शहनाई

बन सपन के सोन-पाँखी पलक पर उतरें
कर रहा मन सूर्य को अमरूद-सा कुतरें
धूप में छत हँस रही है
मुदित अँगनाई

हरित डालों पर फुदकती फुलसुंघी चहकी
सप्तपर्णी की सुरभि-सी ज़िन्दगी महकी
खिल रही है प्रकृति की
चहुँओर अच्छाई

ये जो मौसम है नया एहसास भरने का
दृष्टि में सौन्दर्य का विश्वास भरने का
इसे मत खोना
समय बहुमूल्य है भाई

- अक्षय पाण्डेय
१ अक्टूबर २०२६

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