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         आई शरद पुनीत

 
धरा सींच बारिश गई, आई शरद पुनीत
शरद पवन शीतल करे, गूँजे हिय में गीत

रोम रोम पुलकित हुआ, मन मंदिर है मात
स्वागत को आतुर सभी, चौक पुराएँ तात

शारदीय नवरात्र में, छाया हर्ष उल्लास
कलश दीप माथे सजे, पूरी होती आस

गरवा के मंडप सजे, हाथों में ले साज
ढोलक की हर थाप पर, थिरके सकल समाज

करें वंदना मात की, झूमे सारा गाँव
माँ के आँचल के बिना, नहीं मिलेगी छाँव

शरद सुगंधित हो धरा, झरता हरसिंगार
निर्मल नभ में नाद हो, माता का जयकार

शरद चंद्र से झर रहा, अमृत-सा उजियार
धवल चाँदनी खेलती, चकवी रहती पार

शरद माह की पूर्णिमा, छिटक चाँदनी रेख
रूप धरे नव वधू सा, खेले कला अनेक

मंद बयार महक रही, खुश होते उद्यान
आपस में मिल जुल रहे, अपना हिंदुस्तान

- स्मृति गुप्ता
१ अक्टूबर २०२६

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