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         सजते हैं पंडाल

 
१
जगह-जगह हों जागरण, सजते हैं पांडाल
थापित हों माँ के कई, रूप स्वरूप विशाल
चोला चढ़े सिँगार हो, नया लगे नित भोग
धूप-दीप-नेवेद्य से, दमके मात सुभाल
दमके मात सुभाल, आरती शाम सुबह हों
करें डाँडिया नृत्य, जागरण जगह-जगह हों
२
माता के दरबार में, भक्त झुकाएँ माथ
जगराते में बैठ कर महिमा गाऍं साथ
माँ का कर गुएागान सब, पाते हैं आशीष
सर्वधर्म समभाव को, इससे बड़ा न पाथ
इससे बड़ा न पाथ, पर्व हमको सिखलाता
जो आए दरबार, उसे सुख देना माता
३
होते गरबा नृत्य सँग, कहीं डाँडिया रास
लोगों का उत्साह भी, देखे बनता खास
लाखों की तादाद में, खेलें ये बिन भेद,
ये ही जीवन मूल्य हैं, जहाँ शक्ति का वास
जहाँ शक्ति का वास, भक्त कब श्रद्धा खोते
पूरण होते काज, सफल आयोजन होते
४
भक्ति - शक्ति का पूर्व में, धारा माँ ने भेष
असुरों का संहार कर, संकट किया अशेष
सावित्री, सीता, सती, पुन: बनी दृष्टांत,
देवलोक भी है ऋणी, भूल द्वेष - विद्वेष
भूल द्वेष - विद्वेष, पर्व यह मने भक्ति का
वैसे तो नवरात्रि, पर्व है भक्ति - शक्ति का

- गोपाल कृष्ण भट्ट आकुल
१ अक्टूबर २०२६

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