 |
शारदीय नवरात्र में |
|
|
गौरी अम्बा कालिका, आकर गईं
विराज
शारदीय नवरात्रि में, पूरे करने काज
बहुरंगी परिधान को, बना लिया गणवेश
और लगा है झूमने, गरबों में यह देश
ऊँच-नीच जाने नहीं, भावों को पहचान
सब भक्तों को दे रही, नवदुर्गा वरदान
पहले थे आराधना, आज हुए हैं खेल
इन गरबों की शक्ति ही, आकर कसें नकेल
मंद हुआ स्वर भक्ति का, डीजे का है शोर
लगे रात्रि नवरात्रि की, बाद साँझ के भोर
गरबों के पण्डाल में, आँखें होतीं चार
भक्तों का बे-रोक नित, पनप रहा है प्यार
गरबों के पण्डाल से, देख रहीं माँ हाल
करता नर्तन कौन है, कौन दे रहा ताल
बच्चे भी उत्साह में, लिए डांडिया हाथ
चुनरी बाँधे शीश पर, घूम रहे मिल साथ
सजा-धजा सारा नगर, करता है हैरान
महँगाई का दूर तक, दिखता नहीं निशान
- अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
१ अक्टूबर २०२६ |
|
|
|
|