अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         शरद की चाँदनी

 
जब शरद की चाँदनी रसधार बरसाने लगी
चाँदनी को देखकर के रात मुस्काने लगी

दुष्ट का संहार होवे, सज्जनों का वास हो
देख कर दुर्जन, धरा भी आज अकुलाने लगी

पुष्प की मानिंद बनकर खिल रहे जो जन यहाँ
उन सभी को मात अपने पास बैठाने लगी

डांडिया जब खेलते नरनार मिल जुल कर सभी
संग पुरुष के प्रकृति की टंकार टकराने लगी

आज बरसों औ बरस की हसरते पूरी करो
सृष्टि माँ के पाँव छूने के लिये आने लगी

- सुनीता मलिक सोलंकी
१ अक्टूबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter