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         चलें अब डाँडिया खेलें

 
लो फिर मस्ती में आ जाएँ, चलें अब डाँडिया खेलें
ग़मों को पल में बिसराएँ, चलें अब डॉंडिया खेलें

ये जीवन एक उत्सव है, इसे पल-पल मनाएँ हम
न इसको और उलझाएँ, चलें अब डाँडिया खेलें

रचाकर हाथ में मेहँदी, सजाकर ज़ुल्फ में गजरा
नए रंगों को बिखराएँ, चलें अब डांँडिया खेलें

कभी आगे क़दम रखकर, कभी पीछे क़दम रखकर
ख़ुशी में झूम हम जाएँ, चलें अब डांँडिया खेलें

चलें अब शक्ति के रूपों की पूजा हम करें मिलकर
नमन दुर्गा को कर आएँ, चलें अब डाँडिया खेलें

थिरकती-सी, महकती-सी, बहकती-सी ये रुत आई
चलें हम भी बहक जाएँ, चलें अब डाँडिया खेलें

ये घर-दफ़्तर के कामों से भला फ़ुर्सत कहाँ मिलती
नया कुछ आज कर आएँ चलें अब डाँडिया खेलें

- डॉ सीमा विजयवर्गीय
१ अक्टूबर २०२६

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