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         उत्सव के रंग

 
लबों से उदासी का पहरा गया है
कि मन आज गरबे में लहरा गया है

खनक डांडियों की जो गूँजी यहाँ पर
निराशा का अँधियारा कतरा गया है

भँवर सी वो घूमी है कुछ इस तरह से
कि अंबर का चंदा भी चकरा गया है

लगी गूँजने जब से अरदास माँ की
हवाओं में फूलों का गजरा गया है

सजीं चनिया-चोली में सखियाँ हैं ऐसी
कि उत्सव का हर रंग गहरा गया है

थकन का यहाँ काम कोई नहीं है
कि उत्साह में सारा नखरा गया है

चमक नूपुरों की है छायी गगन में
सितारों को कोई यों ठहरा गया है

ये मन डूब-डूबा है इस रास में आज
कलम पर भी जादू-सा बिखरा गया है

- महेन्द्र तिवारी
१ अक्टूबर २०२६

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