अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        याद आये छाँह वाले दिन  

 
धूप के जलते हुए वन में
बादलों की छाँह वाले दिन
बहुत ही याद आये

आँगने महकी हुई तुलसी
नेह में डूबा हुआ बरगद
प्रार्थना में लीन संध्याएँ
मंदिरों के गूँजते गुंबद
बबूलों के अजनबीपन में
नीम की
गलबाँह वाले दिन
बहुत ही याद आये

तितलियों के पंख चुनता मन
गंध-फूलों से लदी घाटी
और बालू के घरौंदों में
सुगबुगाती हुई परिपाटी
भीड़ के एकांत निर्जन में
बालकों-सी
चाह वाले दिन
बहुत ही याद आये

मोमिया खरगोश-से सपने
और यह तपता हुआ मरुथल
सूखता यह आँख का पानी
छूटता वह रेशमी आंचल
इस स्वयं से जूझते क्षण में
मौन अंतर्दाह
वाले दिन
बहुत ही याद आये

- योगेन्द्र दत्त शर्मा 
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter