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        गरमी संग तनातनी

 
तपते मौसम से यदि नहीं बनी
गरमी के सँग झेलें
तनातनी

सूखे अधरों पर उदित प्यास है
तपती धरती कब से उदास है
कजरारे घन जल से भरे हुए -
बरसें अब इस अँगना प्रयास है
झोंके पछुआ वाले
छलें धनी

पथ पर पग जलते हैं जहाँ धरें
सर पर चुभते शर से सभी डरें
मुकुलित हों तरु-तृण सबहरे दिखें -
श्यामल जलधर आएँ कृपा करें
बदली आए पुरबा
चले छनी

अंगारों का मौसम टले अभी
शीतल जल की धारा चले अभी
मनुजों जीवों पर कुछ दया करो-
चलकर कोई पथिक न
जले अभी
ऋतुओं से अबकब तक रहे ठनी

- प्रो. विश्वम्भर शुक्ल
१ जून २०२६

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