अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        सूरज के चल रहे तीर

 
सूरज के चल रहे तीर
पीर भला किससे कहें

नदियों का चीर हरण जेठ ने किया है
पोखर ने अपना जल तड़प कर पिया है
हो गए सरोवर फ़क़ीर
पीर भला किससे कहें

मुरझाए वृक्ष खड़े गगन को निहारें
पशु-पक्षी व्यग्र हुए इंद्र को पुकारें
झुलस रहा शीतल समीर
पीर भला किससे कहें

श्रमिकों के सिर में है आग का बसेरा
जीवन का रूप-रंग धूप ने सकेरा
लूट रहे ठंडक अमीर
पीर भला किससे कहें

तन का सुख पाने की इच्छा जग आयी
खेतों-बागानों की हरियाली खायी
मर गया मनुज का ज़मीर
पीर भला किससे कहें

सरल-सहज हो जीवन मन-कपाट खोलो
सच्चे सुख के ज्वलंत प्रश्न को टटोलो
हार गए कहते कबीर
पीर भला किसे कहें

- डॉ विजेंद्र पाल शर्मा
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter