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        नेह गीत गाएँ 

 
जेठ का महीना है, आग - आग जीना है
आओ दो पल छत पर
बैठें, बतियाएँ

ताल - तलैया सूखे, घाट हुए संन्यासी
पछुआ ने किया विकल शाम हुई प्यासी
उम्र का बिछौना है, जिन्दगी खिलौना है
आओ दो पल साँसें
गूँथ गुनगुनाएँ

कोटर में काँप रही, प्यास की गिलहरी
मानी अभिमानी, वर्षा भी बहरी
बिटिया का गौना है, सुख का मृगछौना है
आओ दो पल बैठें
नेह गीत गायें

जीवन का अंकगणित, सुलझाते शाम हुयी
दो पल सुस्ता लें हम, नीद कहाँ आम हुयी
माथ पर डिठौना है, सुख कितना बौना है
आओ हम एक हुए,
एक शाम पाएँ

- विजय सिंह
१ जून २०२६

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