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        झुलसे और समय के झुलसे  

 
झुलसे और समय के झुलसे
जेठ महीने में

सड़कें सूनी तप्त धरा जनपथ से हटे हुए
कड़ी धूप में किन्तु श्रमिक हैं श्रम पर डटे हुए
बस दो रोटी के जुगाड़ को
भीग पसीने में

कभी कार्य की जगह दूर हो घर से सोते है
जहाँ न स्वेद सुखाने वाले पंखे होते हैं
कैसे रात बीतती है उस
तपते टीने में

जिसको अवसर मिला आर्त को दुख में फॅंसा गया
जो जितना कमजोर उसे उतना ही कसा गया
शोषण की अनगिन गाथाएँ
उसके सीने में

जलती हुई भूमि पर नंगे पैरों चलना है
घर में चूल्हा जले इसलिये उसको जलना है
पर आतप में तप जो मिलता
जाता पीने में

- डा. उन्नत बहादुर सिंह
१ जून २०२६

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