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        उमस भरी इस दोपहरी में  

 
उमस भरी इस दोपहरी में
काश बाँधकर मलयानिल हम
जरा अंगोछे में रख पाते

तापमान इतना चढ़ आया
उसनाए से हम लगते हैं
ललमुँही उग रही घमौरी
पसीनाए दिन भर रहते हैं
मन करता है इनर देव से
माँग जरा शीतल जल लाते

कैसे - कैसे बिंब लिए अब
गर्मी के ये दिन आये हैं
आँखों के काजल कैसे ये
गालों तक बह कर छाये हैं
काश कहीं दिखता नभ में तो
थोड़ा-सा बादल ले आते

रात हुई है, इस गर्मी में
छत पर ही है मुझको सोना
इससे पहले जरा मुझे है
उन्हें जेठ का चाँद दिखाना
मन था दो-दो चाँद लिए हम
एक नया नवगीत बनाते

- उदय शंकर सिंह 'उदय'
१ जून २०२६

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