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        जेठ के तेवर  

 
जेठ के तेवर क्रोध भरे हैं सूरज की हठधर्मी से
बुरे हाल गर्मी से

सूखी नदी रेत को ओढ़े, जलधारा सब सूखीं,
प्यासे पंछी छज्जे नीचे, गाय फिरती भूखीं
तपती धूप सड़क पर उतरी, लेकर तेज़ अँगारे
पीपल की छाया भी बैठी, घर में पाँव पसारे
सुबह दोपहर घर घुस जाती
तीखी लू बेशर्मी से
बुरे हाल गर्मी से

आम्रकुंज में पके फलों पर, धूप लगी इतराने
माटी की सोंधी खुशबू भी लगी प्यास बहलाने
एसी वाले कमरे सारे उगलें लपटें ऐसे
कंक्रीट के नगर धधकते, जलती भट्ठी जैसे
ताल तलैया प्यासे रोते
कुदरत की बेमर्मी से
बुरे हाल गर्मी से

अंबर से आगी गिरती है धरती तप कर लाल है
जंगल सूखे जंतु भटकते जीवन बस बेहाल है
थकी साँझ में नीम तले जब खाट पे कोमल गद्दा
गीली चादर ओढ़ के सोए बूढ़े जीवन दद्दा
काश पवन का ठंडा झोंका
छू जाए नर्मी से
बुरे हाल गर्मी से

- सुशील शर्मा
१ जून २०२६

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