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        सूरज का मेला

 
तपती धरती तपता अंबर, बड़ा झमेला आया
आया है सूरज का मेला
देखो फिर से आया

मोती बनी
स्वेद की बूँदें, मस्तक चम चम चमके
आम की डाली झूमके बोले, मौसम रसभर महके
अमृत लगे घड़े का पानी, कुल्फी वाला आया
आया है सूरज का मेला
देखो फिर से आया

नानी दादी
का सिर साया, शीतल लगे तपिश में
ऐसा बरसा नौतपा आज, नहा रहे बारिश में
लाल लाल गुलमोहर जैसे सूरज भू पर आया
आया है सूरज का मेला
देखो फिर से आया

दुपहर में
सुस्ताएँ मिलकर, नीम तले सब सोएँ
दादी से हम किस्से सुनकर, कल्पनाओं में खोएँ
धीरे धीरे झरें पत्तियाँ, छाया ने दुलराया
आया है सूरज का मेला
देखो फिर से आया

- सुनीता मलिक सोलंकी 'मीना'
१ जून २०२६

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