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        जेठ की इस धूप से

 
तितलियों के गाँव बिना बरसे
निर्दयी बन जा रहे बादल

जेठ की इस धूप से है तंग गौरैया
जल रहा बुंदेल अंचल दंग औरैया
रच न पाए भूमिका की
आँख में काजल

बिना छतरी खेत में है जूट की खेती
आँच पर लगता चढ़ी है फूट की रेती
बज रही हैं ककड़ियों के
पैर की छागल

तितलियों के गाँव का हर फूल सूना है
गर्म जल से है नहाता मौन जूना है
नसों की तो झनझनाहट
कर रही पागल

- शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
१ जून २०२६

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