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        भट्टी बने मकान  

 
जलने लगी जेठ की दुपहर
जलें खेत खलिहान
आग उगलती सड़कें सूनी
भट्टी बने मकान।

सूखे कुएँ, ताल पपड़ाए
फॅंसी कंठ में प्यास
आसमान तकता पपीहरा
दो बूँदों की आस
भूखी-प्यासी गौरया की
सकते में है जान।

अमलतास ने घबराकर ली
पीली छतरी तान
अमराई के झुलसे मुख पर
फीकी- सी मुस्कान
सिहरन भरता है कोयल का
महाकारुणिक गान।

बूँद- बूँद के ऐसे लाले
पानी कोसों दूर
चार- चार दिन बिना नहाए
रहने को मजबूर
क्या हो ऐसे में दो दिन ही
आ जाएँ मेहमान।

- शशिकांत गीते
१ जून २०२६

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