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        ग्रीष्म के दिन  

 
सुहानी कनकुनी-सी धूप ने तेवर बदल डाले
हवाओ ने दरख्तों पर लगाकर रख दिए ताले
अनूठे नवतपा के रंग तपते
ग्रीष्म के ये दिन

तपन बढ़ने लगी शीतल समीरण दूर जा बैठी
हरित आँचल हुआ धूसर धरा से ताजगी ऐठी
निठुर सूरज तपाए दिन तपाए रात में चंदा
जगत सारा हुआ है तंग तपते
ग्रीष्म के ये दिन

कहीं छुप कर हवा बैठी न पत्ता एक भी हिलता
कहीं लू के थपेड़े ज्यों पवन आवारगी करता
न घर में चैन ना बाहर कहीं भी मन नहीं लगता
कटे मौसम कहो किस ढंग तपते
ग्रीष्म के ये दिन

न बूढ़ों का दिखे जमघट न बच्चे खेलते दिखते
ढला है दिन अभी तक सूर्य के तेवर नहीं थमते
तपी सूरज तपस्वी है स्वयं जलकर चलाता क्रम
जलाता चाँद भी क्यों संग तपते
ग्रीष्म के ये दिन

पसीने से हुए लथपथ बिना श्रम के थके हैं तन
अलस से हो रहे बोझिल उबासी से भरे हैं मन
नहीं रौनक कहीं दिखती झुलसते तन सकारे से
हुए हैं श्याम, गोरे अंग तपते
ग्रीष्म के ये दिन

- सीमाहरि शर्मा
१ जून २०२६

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