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        जेठ की प्यास

 
माथे पर मटकों का सूरज, पाँवों में छाले
दो-दो कोस जल की खातिर चलते दिन काले
धूप उगलती आग गगन से, सूखे कुएँ उदास
प्यास नदी की, फटी हथेली
सूख गई जलधार

बस्ती-बस्ती रीत गया है बरखा का विश्वास
रिक्त घड़ों में गूँज रही है भूखे जल की प्यास
चलते-चलते धूप निगलती रंगों का संसार
गोद में बच्चा आँख में मरुथल
सिर पर दुख का भार

सूख गए हैं ताल-तलैया, रीते सब निर्झर
पेड़ों की शाखों पर बैठा मौन धरे बंजर
राजपथों पर भाषण बरसे, वादों की बौछार
किन्तु गाँव में कभी न पहुँचा
कोई भी करतार

धरती माँ की नीली चूनर तार-तार हो गई
लोभ-लिप्सा की अंधी आँधी नदियों पर सो गई
फिर भी मन में एक मेघ के दीपक का उजियार
शायद सावन किसी मोड़ पर
बरसाए जलधार

- संजय सुजय बासल
१ जून २०२६

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