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        बढ़ी तपन

 
मन के भीतर-बाहर यों बढ़ी तपन
टूट गया सपनों का
सहज संतुलन

लीक हुईं उम्मीदें दर्द हुआ गहरा
भूल गयी कुर्सी दायित्व का ककहरा
पत्तों को चुभी
परा-बैंगनी किरण

डोल रही सड़कें ले हाथों में आरी
गूँगी तकलीफों पर है विकास भारी
एक पत्र छाया भी
हो गयी सपन

गर्म हवाओं में है उड़ता बारूद
दिनचर्या गयी कठिन युद्धों में कूद
आसमान ने तानी
धरती पर गन

अनुकूलित कमरा क्या पीड़ा पहचाने
पर्दे पर मूवी है मूवी में गाने
पानी का पहनावा
आग का बदन

- रविशंकर मिश्र रवि
१ जून २०२६

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