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        सूरज का ताप रहे  

 
बार-बार अंदर बाहर आ देहरी नाप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

मौसम के तेवर, घर में रहते ऐंठे-ऐंठे
गर्म हवा के गर्म थपेड़े कब्जा कर बैठे
अमन-चैन, दहशतगर्दी के सम्मुख काँप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

दादागीरी सूरज की सर चढ़कर बोल रही
एसी-कूलर की हठधर्मी को भी तोल रही
सुबहा के ठंडे कूचे दोपहरी नाप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

- रवि खण्डेलवाल
१ जून २०२६

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