अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        सूरज का ताप रहे  

 
बार-बार अंदर बाहर आ देहरी नाप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

मौसम के तेवर, घर में रहते ऐंठे-ऐंठे
गर्म हवा के गर्म थपेड़े कब्जा कर बैठे
अमन-चैन, दहशतगर्दी के सम्मुख काँप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

दादागीरी सूरज की सर चढ़कर बोल रही
एसी-कूलर की हठधर्मी को भी तोल रही
सुबहा के ठंडे कूचे दोपहरी नाप रहे
ना जाने कब तक बाहर
सूरज का ताप रहे

- रवि खण्डेलवाल
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter