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        ग्रीष्म ऋतु आई

 
ग्रीष्म ऋतु आई
सपनों की सच संग हो गई सगाई

ऊष्म हुआ मौसम, कितना सुख लाया
धरती अँखुआई, मिलन गीत गाया
गेंहूँ की बाली में
सोना रख आई

राधा के झुमके नई फ्राक की माँग
रामसुख ने माथे पर, लिया कलेंडर टाँग
गठी हुई चप्पल की
कील धँस आई

दिन-दिन ज्यों बढ़ता है, सूरज का पारा
छाया को ढ़ूँढ़े है, पाखी बेचारा
मानव ने पेड़ों की,
कर दी कटाई

गर्मी की छुट्टी औ, नानी का घर
हो-हल्ला मस्ती, होकर निडर
मनचाहा शर्बत
लस्सी और ठंडाई

- डॉ. रश्मि कुलश्रेष्ठ
१ जून २०२६

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