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        एक बिलैया

 
गरमी से व्याकुल हो, भैया
घूम रही है एक बिलैया

बैठी थी वह घर के पीछे,
चली गई निमिया के नीचे
लेट गई निश्चिंत वहाँ पर,
घूम रहे सब गोरू-गैया

चैन न पड़ता, फिर उठ जाती
नाले से पानी पी आती
घेरे-घेरे घूम रही 'चीं-चीं-चीं'
कर चुनगुनू चिरैया

जंगल-झाड़ी में फिर पैठी
भोजन की तलाश में बैठी
गटक गई चूहे वह, करने
निकले थे जो 'ता-ता- थैया'

खा-पीकर जा रही मटकती
'मैं आऊँ, मैं आऊँ' करती
'बिल्ली मौसी, बिल्ली मौसी'
बुला रहे सारे छुटभैया

- राममूर्ति सिंह 'अधीर'
१ जून २०२६

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