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        दिनकर आग उगलता 

 
बैठ गगन में रोज अकारण
दिनकर आग उगलता

आँख तरेरे बिना बात ये होकर आग बबूला
साहूकार किसी को जैसे देकर कुछ हो भूला
तेज आँच पर सारे जग को
रहता दिनभर तलता

जलती धरती बोलो किससे अपने दुख को बाँटे
गर्म हवा लू बन कर मारे हरे पेड़ को चाँटे
बड़ी हवेली का माथा भी
लगे तवे सा जलता

प्यासे जीव भटकते सारे देख देख मरीचिका
पुनः जेठ ने सावन की अब खारिज करी याचिका
दूर क्षितिज से बादल लौटा
अपनी आँखें मलता

- राजपाल सिंह गुलिया 
१ जून २०२६

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