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        बिन बुलाए  

 
बिन बुलाए
धूप के तपते हुए दिन
लौट आए

वृक्ष का व्यवहार कितना हो गया रुखा
प्यास भड़की पर नदी का कंठ है सूखा
द्वार आए छाँह के सपने पसीने से नहाए

बिन बुलाए
धूप के तपते हुए दिन
लौट आए

यह समय है, या हथेली पर रखी अंगार है
दिन सुलगते प्रश्न का ही सघनतम विस्तार है
उतर आए पर्वतों से
आस पंछी तिलमिलाए

बिन बुलाए धूप के तपते हुए दिन
लौट आए

- रघुवीर शर्मा
१ जून २०२६

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