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        सूरज की भट्ठी

 
धधक रही सूरज की भट्ठी, पारा पैंतालिस के पार
गर्मी ने इस बार किया है, सबका ही जीना दुश्वार

तपती सड़कें, जलते छप्पर, झुलस रहे सब खेत मकान
प्यासे पंछी ढूँढ़ रहे हैं, छाँव स्नेह की जल, गुड़ धान
हवा चले अंगार लपेटे, सूरज करता धूप प्रहार
कमरा भी तंदूर बना है, पंखे ने है खाई खार
बजा रहा है रोज मोबाइल
खतरे की घंटी हर बार

आमों के पेड़ों पर लेकिन, मीठे फल का है उपहार
कच्ची कैरी, आम-पना ही, बस लगते सुख के आधार
खरबूजा तरबूज लुभाए, बर्फ की चुस्की हर दिन वार
मटके का शीतल जल लगता, जैसे छलके अमृतधार
झुलस रहे गर्मी में ज्यादा
जीव जंतु जन जिम्मेदार

दुपहर के सूनेपन में ही, सो जाते सभी गाँव-गली
नीम तले चौपालें सजती, शाम की महफ़िल लगे भली
कूएँ पोखर सूख गए सब, बिजली करती अत्याचार
नल में भी अब जल न दिखता, चुए पसीने की बस धार

पंखा झलती दादी कहती
अपने किस्से बारंबार

दूर क्षितिज पर बादल कोई, जब वर्षा का दे संदेश
सूखी धरती की आँखों में, चमके आशा किरण विशेष
पहली बूँद गिरे तो लगता, जीत लिया है यह संसार
गर्मी की सब पीड़ा भूले, गाते रहें गीत मल्हार
परिवर्तन ही प्रकृति नियम है,
इस पर भी तो करें विचार

धूप भले तीखी हो कितनी, माना करती भी लाचार
तपिश भरा मौसम ही लाता, सावन का पावन उपहार
जीवन का भी यही नियम है, दुख ही सुख का खोले द्वार
तप कर ही सोने पर आता, सुंदर स्वर्णिम सुखद निखार
वृक्ष लगा, वन दोहन रोकें, और करें संभव उपचार
वर्ना गर्मी और करेगी,
हम सबका जीना दुश्वार

- प्रगति शंकर
१ जून २०२६

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