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       चिलबिल धूप 

 
चिलबिल धूप उतर आई है घर-आँगन, चौपालो में
पीपल वाली छाँव खो गई कंकरी की
दीवालो में

नदिया सिकुड़ी, पोखर सूखे, प्यासे खड़े किनारे हैं
पशु-पंछी सब छाँह खोजते दिन कितने अंगारे हैं
आस टँगी है दूर गगन के काले-काले जालों में
चिलबिल धूप उतर आई है
घर-आँगन, चौपालों मे

अमलतास की पीली चूनर राहों पर बिछ जाती है
गुलमोहर की लाल हथेली गरमी को बहलाती है
फिर भी अकुलाता जीवन ढलती उम्र के सालों में
चिलबिल धूप उतर आई है
घर-आँगन, चौपालो में

चोरी -चुपके बागों से हम आम तोड़कर लाते थे
पकड़े जाने के डर से फिर बहाने सौ बनाते थे
अब बचपन की यादें खोईं दफ़्तर वाली फाइलों में
चिलबिल धूप उतर आई है
घर-आँगन, चौपालो में

पीपल, नीम, बरगद तले अब बैठक कम ही जमती है
ठंडी छाछ घड़े का पानी चर्चा ही बस चलती है
बूढ़े दादा पंखा झलते गुमसुम बैठे ख़्यालों में
चिलबिल धूप उतर आई है
घर-आँगन, चौपालों में

- पारुल तोमर
१ जून २०२६

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