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        गर्मी का मौसम   

 
गर्मी का मौसम ज़्यों दूर दूर बिछा हुआ
पीला-पिघला सुबरन

बन्जारा घूम रहा
है नभ में, लपटों की चादर ओढ़े
आंधी में तिनकों-से बिखर रहे मन्सूबे पक्के-पोढ़े
चौखट के बाहर पग धरते ही आग-आग
हो जाता है तन-मन

आँख मूँद, घोषित
आतंकी-सी इधर-उधर भागती हवा
बस्ती की सारी गतिविधियों को मार गया जैसे लकवा
मछली के प्राण फँसे साँसत में पोखर की देह
हो रही अदहन

चिढ़ा रहे बेहया,
जवास, आक, मस्ती में झूमता बबूल
अमराई-में-तोता-टाँय-टाँय-बोल-रहा-जो-भी-है,-चुप-नहीं-कबूल
मिट्टी में लोट-पोट मिटा रहा है गर्दभ
अपने मन-प्राण की थकन

- डॉ. मृदुल शर्मा
१ जून २०२६

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