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        धरती जलती है  

 
नदिया निर्झर सरवर सूखे
धरती जलती है
मौसम वाली गरम कड़ाही
जमकर तलती है

नागिन-सी फुफकार रही है
वैरिन दोपहरी
पता नहीं है कौन देश में
छाया जा ठहरी

मन बहलाने वाली ठंडी
हवा न चलती है

सूरज का आतंक कहें क्या
जग को जला रहा?
अपनी कौन बिसात धधक-
कर लोहा गला रहा

दिशा-दिशा फुफकार रही है
आग उगलती है

धूलभरी आँधी चुड़ैल-सी
पीछे पड़ जाती
गर्म हवा आँखें तरेरकर
चाँटे जड़ जाती

ऐसे कैसे जिएँ बताओ
जान निकलती है

- मनोज जैन मधुर
१ जून २०२६

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