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        ग्रीष्मकाल तप 

 
ग्रीष्म-काल तप देह को दहे
स्वेद-धार बह नीर-सी बहे
सूर्य देव नभ आग-सा जला
तप्त वायु चल साँस को छला
ताल सूख जल क्षीण हो गया
रूप ग्रीष्म हर रोज ही नया
प्राण आज यह ताप को सहे
ग्रीष्म-काल तप देह को दहे

आग-सी लपटें यत्र-तत्र उठीं
प्यास से तड़प देह सब लुटीं
छाँव को नयन ढूँढते ही रहे
धूप में चरण बार-बार जले
कष्ट का कथन मौन ही कहे
ग्रीष्म-काल तप देह को दहे

पंथ में पथिक श्रान्त हो रुका
भार से सकल गात है झुका
नीर को तरस जीव ने पिया
मेघ को नमन भक्त सा किया
धूप में अनल नित्य ही बहे
ग्रीष्म-काल तप देह को दहे

- महेन्द्र तिवारी 
१ जून २०२६

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