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        उफ्फ ये गर्मी  

 
दिन पकुसाये
रात उबलती
छत दीवारें
आग उगलती
निर्जल व्रत से
बैठी तुलसी
प्यासी चोंचें माँगे पानी
कंठ सुखाती, उफ्फ ये गर्मी

सपना है अब
छत पर सोना
महँगा जैसे
कनक सलोना
सात समुंदर
जाकर भूली
नानी हमको दे गुड़ धानी
छाती फटती, उफ्फ ये गर्मी

नदी कटोरा
लेकर बैठी
बादल से तन
गयी है हेठी
नीर क्षीर को
भूला हंसा
भूल गया मोती की वानी
देह सुखाती, उफ्फ ये गर्मी

- मधुश्री 
१ जून २०२६

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