अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        मन में जनकल्याण बसाए   

 
सूरज की
शहजादी गर्मी नौ माह अज्ञात वास कर
वर्षा-शीत बिता कर आई दूर दूर तक फैलाए पर
मन में जन-कल्याण बसाए

सघन साधना
तीन माह की रीते घट बादल के भरती
खाली समय खेत में सो कर श्रेष्ठ फसल हित शक्ति सेती
मन में जन कल्याण बसाए

अच्छे दिन
लाने की चाहत सह लेती लू-लपट प्रमाद
खारा जल सागर से लेकर मीठा करती भेज प्रवास
मन में जन कल्याण बसाए

भरती खेतों
की बिवाइयाँ काले मेघों के मरहम से
हरियाली धन-धान्य बिखेरे सोखा जल बरसा कर नभ से
मन में जन कल्याण बसाए

- लक्ष्मीनारायण गुप्त
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter