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        काले मेघा दे जा पानी  

 
सबके अपने
ठाट-बाट थे, सबकी अपनी रामकहानी
एक अकेला जेठ आ गया, मरी हुई है
सबकी नानी

सन्नाटे का
भूत चढ़ा है, गली-मुहल्ले सब सूने हैं,
विधवा की बेटी-सी सिमटी, नदिया के भी दु:ख दूने हैं
ताल-तलैया, पोखर प्यासे, लगी रामरट
पानी-पानी

हँसा गुलमुहर
फँसा, दुआरे खड़ा किसी की बाट निहारे
और अगन-सी तपन, थपेडे़ सहता अमलतास मन मारे
सुगना की टिटकोर पियासी, दुपहरिया की
चढ़ी जवानी

हवा प्यास से व्याकुल हाँफे, डगर-डगर छेड़े मनमानी
धरती के हौंसले पस्त हैं मौसम करता आनाकानी
आंखों में कुछ पानी हो तो
काले मेघा दे जा पानी

- डॉ. कामतानाथ सिंह
१ जून २०२६

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