अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        काले मेघा दे जा पानी  

 
सबके अपने
ठाट-बाट थे, सबकी अपनी रामकहानी
एक अकेला जेठ आ गया, मरी हुई है
सबकी नानी

सन्नाटे का
भूत चढ़ा है, गली-मुहल्ले सब सूने हैं,
विधवा की बेटी-सी सिमटी, नदिया के भी दु:ख दूने हैं
ताल-तलैया, पोखर प्यासे, लगी रामरट
पानी-पानी

हँसा गुलमुहर
फँसा, दुआरे खड़ा किसी की बाट निहारे
और अगन-सी तपन, थपेडे़ सहता अमलतास मन मारे
सुगना की टिटकोर पियासी, दुपहरिया की
चढ़ी जवानी

हवा प्यास से व्याकुल हाँफे, डगर-डगर छेड़े मनमानी
धरती के हौंसले पस्त हैं मौसम करता आनाकानी
आंखों में कुछ पानी हो तो
काले मेघा दे जा पानी

- डॉ. कामतानाथ सिंह
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter