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        जेठ खींसे है निपोरे

 
धूप का स्नान करने चल पड़े काकू
ठोंक होंठों में भरी है
ठूँस तम्बाकू

चिपककर सीने में दुपकी जाए बनियाइन
सिहरकर चूमे पसीना मारता लाइन
जेठ खींसें है निपोरे
जिस तरफ झाँकूँ

छेद बढ़ते बर्तनों में छेद वसनों में
झुग्गियों में झोपड़ों में निरे भवनों में
सड़क से संसद तलक
जब जिस तरफ ताकूँ

भेद कर इन खोलियों में बादशाहों ने
भर दिया है फूँक मंतर मरी आहों में
कुछ अहेरी उपवनों के
बन गए डाकू

जोगना पानी को था हैं जोगते कालिख
दाग बनकर रात दिन जो कर रहे पॉलिश
किस तरह कैसे भला
इस भेद को ढाँकूँ

मत तपा! व्याकुल दुपहरी मेघ के घर जा
नेह देकर बूँद लेकर ही धरा पर आ
बदलियों की फटी भीतें
नीर से टाँकूँ

- जिज्ञासा सिंह
१ जून २०२६

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