अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        आग दोपहरी  

 
दोपहर है जेठ की अब गाँव में ठहरी
धूप सुनती ही नहीं है
हो गयी बहरी

तप रही पुरजोर पछुआ जोर अजमाये
अब बहुत छोटे हुये हैं पेड़ के साये
दूर झिलमिल हिल रही है
आग दोपहरी

लू लगाती है तमाचे कान के नीचे
गेह में गुम-सुम छिपे हैं आँख को मीचे
हैं पसीने से हुये तर
ऊब है गहरी

आबाद घर खमसार है चहके बरोठे
खेलते हैं दहला पकड़ दो चार बैठे
शोर करते जा रहे अब
और मत दह री

लौटते दिन पशु-पखेरू ताप से घायल
बादलों को याद करते माँगते है जल
दे रही मन को दिलासा
नीम है छहरी

- जयराम जय 
१ जून २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter